मैने अमित को लिखा
जैन धर्म और दर्शन को जानने के उनकी परम्परा को जानना भी आवश्यक है। भारत वर्ष की दो प्राचीन परम्पराए है- श्रमण- परम्परा, ब्राहृमण-परम्परा, भगवान महावीर के समय श्रमण परम्परा के चालिस अधिक सम्प्रदाय हुआ करते थे। वर्तमान मे दो सम्प्रदाय उपलब्ध है- जैन और बोद्ध। जैन परम्परा के मुल स्त्रोत भगवान ऋषभ है। वर्तमान मे भगवान महावीर का शासन चल रहा है। उनकी परम्परा ढाई हजार वर्ष पुरानी है।
जैनत्व काअर्थ है- सम्यक-दर्शन,सम्यक ज्ञान, और सम्यक चारित्र, कि आराधना।
एक बार आचार्य तुलसी से पुछा गया-” क्या भगवान महावीर जैन थे? आचार्य श्री ने कहा-” नही, वे जैन नही थे। वे जिन थे,उनको मानने वाला जैन होता है। वे जैन ना होकर भी, दूसरे शब्दो मे अजैन होकर भी,महान धार्मिक थे। इसका फलित स्पष्ट है कि कोई व्यक्ति जैन होकर ही धार्मिक हो सकता है, ऐसा अनुबध नही है। जैन, वैष्णव, शैव,बोद्ध-ये सब नाम धर्म की परम्परा सूचक है,इनकी धर्म के साथ व्याप्ति नही है। इसी सत्य की स्वीकृति का नाम असाम्प्रदायक दृष्टी है।
साम्प्रदायिकता एक उन्माद है। उसके आक्रमण का ज्ञान तीन लक्षणो से होता है
(१) सम्प्रदाय और मुक्ति का अनुबधन– मेरे सम्प्रदाय मे आओ, तुम्हारी मुक्ति होगी अन्यथा नही होगी।
(२) प्रशसा एवम निन्दा– अपने सम्प्रदाय कि प्रशसा और दुसरो कि निन्दा।
(३)ऐकान्तिक आग्रह– दुसरो के दृष्टीकोन को समझने का प्रयत्न ना करना।
अमितजी, मनुष्य मे झुकाव की मनोवृति होती है। वह अपने अनुकुल चिन्तन और तर्क के प्रति झुक जाता है। झुकाव का कारण राग और द्वेष है। जिसमे राग-द्वेष के उपशमन की साधना नही होती, वह मध्यस्थ या तटस्थ नही हो सकता। मध्यस्थ भाव को प्राप्त किए बिना कोई भी व्यक्ति शास्त्रज्ञ नही हो सकता।
शमार्थ सर्वशास्त्राणि, विहितानि मनीषिभि:।
स एव सर्वशास्त्रज्ञः,यस्स शान्त सदा मनः॥
अर्थात मनीषियो ने शास्त्रो का निर्माण शान्ति के लिए किया। सब शास्त्रो को जानने वाला वही है जिसका मन शान्त है।”
धर्म के नाम पर अशान्ति उभारने वाला शास्त्रज्ञ नही हो सकता है। जो स्वय अशान्त है वह शास्त्रार्थ करने के काबिल केसे हो सकता है।
अमितजी, सबसे पहले आप को खुशी होनी चाहिऐ कि जैन धर्म हजारो वर्ष पुराना है। देश विदेश के कई राजामहाराजा इसमे दिक्षित है। कई इसमे तिर्थकर हुऐ है। जैन धर्म ने स्त्रि पुरुष का भेद नही रखा इसलिऐ मलिनाथ हमारी तिर्थकर है। विशेष जैन धर्म हजारो वर्ष पुराना होते हुऐ भी आज के युग मे भी प्रासगिक बना हुआ है यह बात दुनिया भर के वैज्ञानिक, दार्शनिको ने माना। जैन धर्म एवम जैन मान्यताओ को पुर सृष्टी जानती है मानती है। आपको छोटा सा उदारहण देता हू दुनिया के किसी भी स्थान पर चले जाऐ बडी से बडी से बडी हॉटल मे, वहॉ आपको जैन फुड मिलेगा। और अगर कोई आपसे पुछता कि आप कोन ? कैसे ? तो इतने बडे अज्ञानी व्यक्ति को आपकी नही किसी भगवान कि जरुरत है। ससार के बच्चे-बच्चे को पता है- अहिसा का अर्थ क्या है ? जिन्न के क्या मायने है ? फिर कोई किसीको राक्षस कि उपमा दे तो आप समझले उनमे तार्किक शक्ति का अन्त है। सवसे पहले तो ऐसे प्रशन पुछने वालो का क्या इतिहास है ? कोन और कितने लोग जानते है ? उनके पास कोनसी साहत्यिक सम्पनता है ? उपरोक्त सगठन पिछले डेढ दशको से जैन विरोधि गतिविधिया राजस्थान के सुमेरपुर समिती के आसपास से चला रही है। ऐसे १००-५०० लोग, लोगो को भ्रमित करने कि कोशिश करते है। लोगो ने उन्हे अमान्य कर दिया। आपका ऐसेकिसी भी असामाजिक तत्वो को जवाब देना या लेना उचित नही है। आप जैनी है, आप अपने आपमे महान है। किसी भी व्य्क्ती के कहने से फर्क नही पडता है। आप जैन समाज और धर्म के विभिन्न पहलुओ को भडास पर लिखते रहे क्यो कि भाई रुपेशजी ने पहले धोषणा कर दि है कि वो सभी धर्मो को समान दृष्टि से देखते है। व भडास हम जैनी लोगो का भी है। हमारा अपना भडास है तो हम क्यो नही लिखे ? किन्तु ख्याल रहे जिवन भर लिखते रहे ताकि लोग पढते रहे। मै विश्वास करता हू अगर मेरे प्रिय मित्र रुपेशजी का आर्शिवाद रहा तो भडास पर बहुत जल्दी ही जैन पाठको लेखको कि सख्या मे इजाफा होगा। अमितजी जैन धर्म पर लिखते रहे, सवाल जवाब का फार्मेट ना बनाऐ, क्यो कि हम सभी के पास बिना हाथ पैर वाले सवालो के जवाब किस भाषा मे दे- एक जैनी के लिऐ सोचनेवाली बात है।
अमित भाई,आप कुछ विचित्र सा बर्ताव करने लगे हैं
